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सिजेरियन डिलीवरी है बेहद खतरनाक, दर्द सहने की आदत डालिए

 


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सिजेरियन के प्रति महिलाओं का बढ़ता रुझान उनमें प्लेसेंटा प्रीविया और प्लेसेंटा एक्रीटा की समस्या बढ़ा रहा है। नतीजतन अत्यधिक ब्लीडिंग और हैमरेज मां और गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए जानलेवा बनता जा रहा है। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल और रेफरल सेंटर क्वीन मेरी की इमरजेंसी में रोजाना ऐसी दो से तीन मरीज आ रही हैं। दर्द सहने की थोड़ी आदत डाल लीजिए, वरना यह डर आप और आपके गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है। आम तौर पर प्लेसेंटा यानी गर्भनाल बच्चेदानी के ऊपर होती है। प्लेसेंटा प्रीविया की स्थिति में यह नीचे की तरफ होती है। पहले प्रसव के दौरान दिक्कतें और सिजेरियन इसका मुख्य कारण है। सिजेरियन के कारण गर्भनाल बच्चेदानी के नीचे की तरफ हो जाती है। वहीं, 35 से ज्यादा की उम्र में प्रसव और गर्भाशय में रसौली (फाइब्रॉइड) निकलना जैसी दिक्कतें होती हैं। गर्भनाल बच्चेदानी के आसपास या यूरिनरी ब्लैडर (पेशाब की थैली) में घुस जाती है। ऐसी स्थिति जानलेवा हो सकती है। इसमें गर्भनाल रहने पर अत्यधिक रक्तस्राव के साथ बच्चेदानी फट जाने की आशंका बढ़ जाती है। सिजेरियन होना इसकी मुख्य वजह है। हमारे पास आने वाली मरीजों की केस स्टडी बताती है कि जिनमें पहला बच्चा सिजेरियन से हुआ, उनमें यह समस्या देखने को मिलती है। इसके पीछे प्रमुख वजह यही है कि स्पेशलिस्ट से सिजेरियन कराने के बजाय ऐसे चिकित्सक से सिजेरियन करा लेना, जिन्हें यह भी पता नहीं होता कि कितने टिश्यूज छोड़ने हैं, कितने नहीं। इसका नतीजा प्लेसेंटा एक्रीटा के रूप में सामने आता है।

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महीने में करीब 300 प्रसव होते हैं। इसमें 25 से 30 सिजेरियन केस होते हैं। ये कहीं न कहीं से रेफर्ड केस होते हैं, जो काफी हालत बिगड़ने के बाद हमारे पास आते हैं। इसके अलावा हमने साल में दो केस प्लेसेंटा एक्रीटा वाले किए। हालांकि उन्हें बाद में क्वीन मेरी भेजा था मॉनीटरिंग के लिए। एक महीने में दो केस तो प्लेसेंटा एक्रीटा वाले आते ही हैं। ज्यादातर वजह पहला सिजेरियन ही होती है। एक महीने में 600 से 700 डिलीवरी होती है। इसमें से 200-250 सिजेरियन होते हैं। जबकि ऑन डिमांड वाले केस रोज एक-दो तो आते ही हैं, जिनकी हमें कभी डांट कर तो कभी प्यार से काउंसलिंग करनी होती है।

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गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. सुजाता देव बताती हैं कि कलर डॉप्लर से ही इसका पता चल पाता है। अगर समस्या है तो ऐसे अस्पताल में ही इलाज कराएं जहां ऑपरेशन के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टर, यूरोलॉजिस्ट, जांच की सुविधाएं, ब्लड की तुरंत उपलब्धता हो। इसके अलावा नौ महीने तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है। डॉ. सुजाता बताती हैं कि 12 से 24 घंटे का दर्द गर्भवती सहना नहीं चाहती हैं। मॉनीटरिंग कोई करना नहीं चाहता। थोड़ी सी जल्दबाजी भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती है। जब तक जरूरी न हो तब तक सिजेरियन कराने की सोचे भी नहीं।