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आखिर कैसे बनता है मखाना, सच जानकर होश उड़ जायेंगे

 आप सभी लोग मखाने के बारे में अच्छी तरह से जानते होंगे। मखाने का प्रयोग हर घर में होता है। मखाने में तरह-तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह एक जलीय घास है जिसे कुरूपा अखरोट भी कहते हैं। आप लोग नहीं जानते होंगे कि मखाने में तरह तरह के प्रोटीन जैसे कि आसानी से पचनेवाला प्रोटीन पाए जाते हैं। मखाना औषधीय गुणों से भरपूर होता है। लोग मखाने का सेवन सूखे मेवे के रूप में करते हैं।


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मखाने का सेवन करने से चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ती है और हम जल्दी ही बूढ़े नहीं होते हैं। यदि हर व्यक्ति मखाने का इस्तेमाल नियमित तौर पर सही तरीके से करेगा तो उसको तरह-तरह के लाभ होंगे। मखाने का सेवन करने से हमारे दांत, स्वस्थ तंदुरुस्त और मजबूत बने रहते हैं। मखाने का इस्तेमाल कई लोग उपवास के पकवानों में करते हैं। बहुत सी दवाएं जो ताकत प्रदान करती हैं, वह मखाने से ही बनाई जाती हैं। मखाने का प्रयोग दवाओं में होता है। इसलिए मखाने को सहयोगी आयुर्वेदिक औषधि भी कहा जाता है।

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ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए मखाना बहुत ही फायदेमंद होता है। अगर आपको भी कमर दर्द और घुटनों का दर्द है तो आप मखाने का सेवन जरूर करें। मखाने के बीजों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, वसा, कैल्शियम एवं फास्फोरस के अतिरिक्त केरोटीन, लोह, निकोटिनिक अम्ल एवं विटामिन बी-1 जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

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लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि मखाना कैसे बनता है और कहां बनता है। मखाने की खेती ज्यादातर बिहार के मिथिलांचल में होती है। यहां पर भारत का 80% मखाना उगाया जाता है। मखाने के बीज सफेद और छोटे होते हैं। उनको दिसंबर से जनवरी महीने के बीच में तालाबों के अंदर डाल दिया जाता है। अप्रैल महीने में पौधे में फूल आ जाते हैं। जबकि जून और जुलाई के महीने में 24 से 48 घंटे तक सतह पर तैरते हैं और फिर नीचे जा बैठते हैं। मखाने के पल बहुत ही कांटेदार होते हैं। मखानों को बाहर निकालने में लगभग एक 2 महीने का समय लगता है।