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आयूर्वेद के भोजन संबंधी महावाक्य ज़िसे अपनाने से आप रहंगे स्वस्थ्य और युवा हमेशा

 

जब भूख लगती है तब सिद्धांत नहीं भोजन चाहिये। भोजन एक व्यक्तिगत मसला है। परन्तु यदि हम आयुर्वेद के कुछ महावाक्यों को याद रखकर, और उस ज्ञान का उपयोग करते हुये भोजन करें तो स्वास्थ्य उत्तम स्वास्थ्य बने रहने की संभावना बनी रहती है। आज की चर्चा आयुर्वेद के आहार-विषयक महावाक्यों पर केन्द्रित है, जिनकी वैज्ञानिकता का लोहा दुनिया भर के वैज्ञानिक आज भी मानते हैं। तो आइये, आनंद लेते हैं इस ज्ञान का जो हमें बीमारी से बचाकर परिवार का लाखों रूपया व्यर्थ होने से बचाने में सक्षम हैं। और हाँ, आयुर्वेद में ज्ञान की सीमायें अनंत हैं। मेरे ध्यान में भोजन से संबंधित लगभग 1000 महावाक्य हैं। उनमें से यह केवल प्रारंभिक सूची है जिसके बिना हमारा काम ही नहीं चल सकता। आप इसमें अपने प्रिय सूत्र या प्रिय महावाक्य जोड़ते रहिये, स्वस्थ रहिये और प्रसन्न रहिये।

1. आरोग्यं भोजनाधीनम्। (काश्यपसंहिता, खि. 5.9): सबसे पहले तो हमें यह जान लेना चाहिये, जैसा कि महर्षि कश्यप कहते हैं, कि आरोग्य भोजन के अधीन होता है। सारा खेल भोजन का है। इस महावाक्य का अर्थ यह मानिये कि खाने को खानापूर्ति की तरह मत लीजिये।

2. नाप्रक्षालितपाणिपादवदनो (च.सू.8.20): महर्षि चरक ने कम से कम पांच हजार साल पहले यह महत्वपूर्ण सूत्र दिया था। आचार्य वाग्भट ने भी इसे सातवीं-आठवीं शताब्दी में धौतपादकराननः (अ.हृ.सू. 8.35-38) के रूप में पुनः लिखा। इसका साधारण अर्थ यह है कि भोजन करने के पूर्व हाथ, पाँव व मुंह धोना आवश्यक है। इसके वैज्ञानिक महत्त्व पर बड़ी शोध हुई है। उनमें से एक बात यह है कि लन्दन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के वैज्ञानिकों द्वारा की गयी एक शोध से पता लगा है कि हाथ धोये बिना भोजन लेने की आदत के कारण अनेक बीमारियाँ संक्रमित करती हैं। हाथ धोये बिना खाना खाने की आदत के कारण अकेले डायरिया से ही सालाना 23.25 अरब डॉलर की हानि भारत को हो रही है। यह हानि भारतीय अर्थव्यवस्था के कुल जीडीपी का 1.2 प्रतिशत है। हाथ धोने में लगने वाले कुल खर्च को समायोजित करने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था को सालाना 5.64 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। यह हाथ धोने में संभावित लागत का 92 गुना है। आयुर्वेद में भोजन के सम्बन्ध में अनेक महावाक्य हैं जिनका पालन कर परिवार, समाज और देश का बहुत धन बचाया जा सकता है।

3. आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृद्देहधारकः। आयुस्तेजः समुत्साहस्मृत्योजोऽग्निविवर्द्धनः। (सु.चि., 24.68): स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और बीमारी को रोकने में भोजन का स्थान रसायन और औषधि से कम नहीं है। इस सूत्र का अर्थ यह है कि आहार से संतुष्टि, तत्क्षण शक्ति, और संबल मिलता है, तथा आयु, तेज, उत्साह, याददाश्त, ओज, एवं पाचन में वृद्धि होती है। सन्देश यह है कि साफ़-सुथरा, प्राकृतिक और पौष्टिक भोजन शरीर, मन और आत्मा की प्रसन्नता और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है।

4. नाशुद्धमुखो (च.सू.8.20): अशुद्ध मुंह से अर्थात मुंह की शुद्धता सुनिश्चित किये बिना भोजन नहीं लेना चाहिये। साफ़-सफाई के पश्चात ही भोजन का आनंद लेना उपयुक्त रहता है।

5. न कुत्सयन्न कुत्सितं न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत (च.सू.8.20): दूषित अन्न या भोजन या दुश्मन या विरोधियों द्वारा दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।

क्रमाक जारी ….