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बांग्लादेश उच्च न्यायालय ने विधवा हिंदू महिलाओं की मदद के लिए पहली बार ऐतिहासिक फैसला दिया



बांग्लादेश में विधवा हिंदू महिलाओं की मदद के लिए पहली बार ऐतिहासिक फैसला दिया है। यहां के उच्च न्यायालय ने कहा है कि हिंदू विधवाओं का उनके मृत पति के कृषि और गैर-कृषि भूमि पर अधिकार होगा। अदालत ने कृषि और गैर-कृषि भूमि में कोई भेद नहीं किया है। इस तरह बांग्लादेश में हिंदू विधवाएं अब अपने पति की सारी संपत्ति में हिस्सा लेने की हकदार होंगी।

अपने जीवनकाल के दौरान कानूनी जरूरतों के लिए जमीन बेचने का भी मिलेगा अधिकार
मौजूदा कानून के मुताबिक हिंदू विधवाएं अपने जीवनसाथी की सिर्फ आवास भूमि की ही हकदार होती थीं जिसमें कृषि और गैर-कृषि भूमि या अन्य संपत्ति शामिल नहीं होती थी। द डेली स्टार ने बताया कि हिंदू विधवाओं को अब अपने जीवनकाल के दौरान कानूनी जरूरतों के लिए जमीन बेचने का भी अधिकार मिलेगा। उच्च न्यायालय का यह फैसला एक निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए खुलना जिले के नागरिक ज्योतिंद्रनाथ मोंडल द्वारा दायर एक नागरिक संशोधन याचिका के बाद आया है।7 मार्च 2004 को खुलना के संयुक्त जिला जज ने ज्योतिंद्रनाथ द्वारा दायर एक मामले में फैसला सुनाया कि उनके बड़े भाई की विधवा गौरी दासी को उसके दिवंगत पति की कृषि भूमि पर अधिकार मिलेगा। ज्योतिंद्रनाथ ने गौरी के नाम पर 1996 में दर्ज जमीन के रिकॉर्ड को चुनौती दी थी।

फैसले की प्रशंसा
बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-ईसाई ओइक्या परिषद के महासचिव राणा दास गुप्ता ने हाई कोर्ट के इस फैसले की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक फैसला है और इससे असहायम हिंदू विधवा महिलाओं के हितों की सुरक्षा होगी। बता दें कि बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं को हिंदू महिला अधिकार संपत्ति कानून 1937 के तहत अधिकार मिला है। अब तक हिंदू विधवाओं को पति की सारी संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था।