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जॉर्ज फ्लॉयड विरोध-प्रदर्शन: जानें आख़िर क्यूँ पूरी दुनिया में क्यों तोड़ी जा रही हैं ये मूर्तियां


पिछले दिनों अमरीका में एक काले व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दुनिया भर में नस्लवाद के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.
इंग्लैंड में नस्लवाद का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने 17वीं सदी में गुलामों की खरीद-फरोख्त करने वाले एक सौदाग, एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति गिरा दी है. प्रदर्शनकारियों ने इसे तुरंत एक बंदरगाह के गहरे पानी में डुबो दिया.
माना जाता है कि एडवर्ड कोलस्टन अपने जहाजों में 80 हजार पुरुष, महिलाओं और बच्चों को अफ्रीका से ले गए थे. लेकिन उनके गृह नगर ब्रिस्टल में सम्मान के तौर पर उनकी प्रतिमा सदियों तक लगी रही. ब्रिस्टल को उनकी दौलत का खासा फायदा हुआ था.
रविवार को सरकार ने उनकी मूर्ति गिराने की इस घटना की निंदा की लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी यह कार्रवाई बदलाव का प्रतीक है.इतिहासकार डेविड ओलुसोगा ने बीबीसी से कहा, "इस तरह की प्रतिमाएं ये कहती हैं कि ये महान व्यक्ति थे और उन्होंने कई बड़े-बड़े काम किए. लेकिन यह सच नहीं है. वह गुलामों के सौदागर और हत्यारे थे."
नस्लवाद के ख़िलाफ़ हो रहे दुनिया भर के प्रदर्शनों ने अचानक ही शहरों के औपनिवेशक और गुलामों की सौदेबाजी वाले इतिहास पर रोशनी डालनी शुरू कर दी है. खास कर उन लोगों पर जो इस कारोबार के नुमाइंदे थे.
 हेनरी डनडेस
स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग में गुलामी (दास प्रथा) को खत्म करने के लिए देर से कदम उठाने वाले एक राजनीतिक नेता की याद में बने स्मारक पर लोगों ने स्प्रे-पेंट कर जॉर्ज फ्लॉयड और बीएलएम ( ब्लैक लाइव्स मैटर्स) जैसे नारे लिख दिए. एडिनबर्ग के सेंट एंड्र्यू स्कवेयर पर 150 फीट (46 मीटर) लंबे मेलविले स्मारक को 1823 में हेनरी डनडेस की याद में बनाया गया था.
डनडेस 18वीं और 19वीं सदी में देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे और उन्हें 'बेताज बादशाह' भी कहा जाता था. कहा जाता है कि उन्होंने गुलामी खत्म करने के लिए काफी धीमे कदम उठाए थे. अगर उन्होंने दास प्रथा खत्म करने के लिए लाए गए संशोधन बिल को लेकर सक्रियता दिखाई होती तो यह प्रथा 1792 में ही खत्म हो जाती. उनकी वजह से गुलामी खत्म करने का कानून लागू करने में 15 साल की देरी हुई. उनके स्मारक को गिराने के लिए हजारों लोगों ने एक याचिका पर दस्तखत किए हैं.
इस स्मारक को हटाने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन को देखते हुए अधिकारियों ने ऐलान किया कि यहां एक स्मृति पट्टिका लगाई जाएगी, जिसमें गुलामी के साथ इस शहर के संबंध का जिक्र होगा.
एडिनबर्ग के सिटी काउंसिल के नेता एडम मैकवी ने बीबीसी स्कॉटलैंड से कहा, "हमें अपनी कहानी कहने की जरूरत है और यह सुनिश्चित करना है लोग दुनिया के इतिहास में एडिनबर्ग की भूमिका समझें. सिर्फ उस हिस्से को नहीं जिन पर हम गर्व करते हैं बल्कि उस हिस्से को भी जिसे लेकर हम शर्मसार हैं.''किंग लियोपोल्ड-2
बेल्जियम में लोग सबसे लंबे समय तक देश पर शासन करने वाले राजा लियोपोल्ड -2 की मूर्तियों को तोड़ने की मांग कर रहे हैं. इसके समर्थन में ऑनलाइन याचिकाएं शेयर की जा रही हैं और इन पर हजारों लोग दस्तख्त कर चुके हैं. इस मामले में कुछ नस्लवाद विरोधी प्रदर्शनकारियों ने सीधी कार्रवाई की है.
यहां के घेंट शहर में औपनिवेशिक काल के इस राजा की मूर्ति पर लाल रंग की पेंट पोत दी गई. सिर पर कपड़ा बांध दिया गया, जिसमें लिखा था, "आई कांट ब्रीद".
अमरीका में हाल में एक गोरे पुलिसवाले के हाथों एक काले नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की उस वक्त मौत हो गई थी जब पुलिसवाले ने अपने घुटने से फ्लॉयड की गरदन दबा दी. मौत से पहले ज़मीन पर पड़े फ्लॉयड कह रहे थे, "मेरा गला छोड़ दो. आई कांट ब्रीद (मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं)".
इस घटना के बाद से ही पूरा अमरीका प्रदर्शनों की आग में जल रहा है. इन प्रदर्शनों का असर दुनिया के दूसरे हिस्सों में देखने को मिल रहा है.
बेल्जियम में प्रदर्शनकारियों ने एंटवेर्प में इस राजा की एक और प्रतिमा में आग लगा दी. इसे अधिकारियों ने बाद में यहां से हटा लिया. उन्होंने बताया कि इस मूर्ति को अब म्यूजियम भेज दिया गया है. ब्रसेल्स में उनकी एक मूर्ति पर 'एसेसिन' यानी हत्यारा लिख दिया गया.किंग लियोपोल्ड-2 ने बेल्जियम में 1865 से लेकर 1909 तक शासन किया था. लेकिन वह कोंगो गणराज्य में किए अपने अत्याचार की वजह से कुख्यात रहे. यूरोप के सबसे छोटे देश के सम्राट ने 1885 से 1908 के बीच कोंगो गणराज्य (डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोंगो) को अपना निजी उपनिवेश बना लिया. पुराने वक्त में इसे कोंगो फ्री स्टेट के नाम से जाना जाता था.
उन्होंने इस देश को श्रमिकों के एक विशाल शिविर में बदल दिया और रबड़ के कारोबार से अकूत संपत्ति कमाई. जो लोग श्रमिकों की गुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते थे उन्हें अक्सर गोली मार दी जाती थी.
उन्होंने अपने सैनिकों को मारे गए लोगों के हाथ इकट्ठा करने का आदेश दिया था. बताया जाता है कि लियोपोल्ड ने कोंगो के कम से कम एक करोड़ लोगों को मार कर अपना शासन कायम किया.
उन्होंने कोंगो के लोगों को बेल्जियम के ह्यूमन जू में रखा. उन्हें कोंगो फ्री स्टेट पर अपना कब्जा हटाने के लिए बाध्य किया गया. 1908 में कोंगो उनसे मुक्त हुआ लेकिन इस देश को बेल्जियम से 1960 तक आजादी नहीं मिल पाई थी.
कुछ लोग किंग लियोपोल्ड-2 की मूर्तियों को हटाने का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि किंग लियोपोल्ड की वजह से बेल्जियम इतना धनी हो सका. उनके वक्त में बेल्जियम की कारोबारी अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सफलता मिली.रॉबर्ट ई. ली
अमरीका का वर्जिनिया प्रांत कन्फेडेरेट जनरल रॉबर्ट ई. ली की मूर्ति हटा रहा है. इसे जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया था.
1890 में स्थापित 12 टन की इस मूर्ति को हटाने का ऐलान करते हुए गवर्नर राल्फ नॉर्दम ने कहा, "अब हमने लोगों को इतिहास के झूठे विवरणों को बारे में बताना बंद कर दिया है. यह मूर्ति यहां लंबे समय से थी. इसे लगाना तब भी गलत था और अब भी इसे यहां रहने देना गलत है. इसलिए हम इसे हटा रहे हैं."
प्रांत की राजधानी रिचमंड के मॉन्यूमेंट एवेन्यू में लगी यह पांचवीं कन्फेडेरेट प्रतिमा थी, जिस पर प्रदर्शनकारियों ने नारे लिख दिए थे. इनमें 'व्हाइट सुप्रीमेसिस्ट (श्वेत श्रेष्ठता) पर लगाम लगाओ' जैसे नारे भी शामिल थे.
रॉबर्ट ई. ली 1861 से 1865 के बीच चले अमरीकी गृह युद्ध में दास प्रथा के समर्थक संघीय राज्यों की सेना के कमांडर थे. यह दक्षिणी राज्यों का संघ था.
ली ने गुलामों की सेवा लेने वाले वर्जिनिया के एक धनी परिवार में शादी की थी. बाद में अपने ससुर की मौत के बाद उन्होंने सेना से छुट्टी लेकर उनकी जायदाद संभालनी शुरू कर दी थी. उन्हें मुक्ति के लिए आंदोलन करने वाले गुलामों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. उन्होंने उनके आंदोलनों को कुचलने के लिए कई कदम उठाए थे.
दस्तावेज बताते हैं कि उन्होंने भागने की कोशिश करने वाले गुलामों की जबरदस्त पिटाई को बढ़ावा दिया. उन पर कई गुलाम परिवारों को बर्बाद करने के आरोप हैं. अमरीका में काफी लोग ली को देश के गुलामों के ख़िलाफ़ हुए अत्याचार और दास प्रथा के इतिहास के प्रतीक के रूप में देखते हैं.
ली की मूर्तियों समेत प्रदर्शनकारियों ने कई और कन्फेडेरेट मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया था. कई लोगों का मानना है कि इन मूर्तियों को न हटाया जाए क्योंकि वे अमरीकी इतिहास के निर्माताओं की हैं. इन्हें दक्षिणी राज्यों की संस्कृति का निर्माता कहा जा रहा है.विंस्टन चर्चिल
लंदन में पूर्व ब्रितानीप्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया और इस पर प्रदर्शनकारियों ने 'नस्लवादी' लिख दिया. दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन को जीत दिलाने के लिए चर्चिल की सराहना की जाती है.
ब्रिटिश सरकार की वेबसाइट में उन्हें "एक प्रेरक राजनीतिज्ञ, लेखक, वक्ता और नेता" कहा गया है. 2002 में बीबीसी के एक सर्वे में उन्हें अब तक का सबसे महान ब्रिटिश शख्स बताया गया था. लेकिन कुछ लोगों के लिए वह विवादास्पद शख्स हैं. नस्ल के बारे में उनके विचारों की वजह से लोग उन्हें विवादित व्यक्ति मानते हैं.
जल्द आने वाली किताब 'चर्चिल मिथ्स' के सह-लेखक और इतिहासकार रिचर्ड टोये कहते हैं कि "निश्चित तौर पर चर्चिल यह मानते थे कि श्वेत लोग श्रेष्ठ होते हैं. उन्होंने खुल कर यह कहा. चर्चिल ने भारतीयों के बारे में अशोभनीय टिप्पणियां की. वह कहते थे के वे जानवर हैं, उनका धर्म भी जानवरों का है. उन्होंने चीनियों के बारे में भी ऐसी ही बुरी बातें कहीं. मैं उनके ऐसे कई बयान गिना सकता हूं."
टोये कहते हैं, "यह समझने की जरूरत है कि चर्चिल की विक्टोरियन पृष्ठभूमि उन पर हावी रही. लेकिन मेरा मानना है कि नस्ल के बारे में उनके विचारों को सिर्फ इसी एक चीज ने प्रभावित नहीं किया था क्योंकि वक्त के साथ ये बदलते रहे थे."
2015 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में 'चर्चिल: द एंड ऑफ ग्लोरी' के लेखक जॉन चार्मले ने कहा था कि चर्चिल नस्लवाद के पदानुक्रम में विश्वास करते थे. यानी मानते थे कि कोई नस्ल श्रेष्ठ है तो कोई उससे नीचे. चर्चिल के मुताबिक़ इस हिसाब से प्रोटेस्टेंट ईसाई सबसे ऊपर हैं. उसके बाद श्वेत कैथोलिक. भारतीय, अफ्रीकियों से ऊपर हैं.
1937 में चर्चिल ने फिलीस्तीन रॉयल कमीशन से कहा, "मैं यह बिल्कुल नहीं मानता कि अमरीका के रेड इंडियंस या ऑस्ट्रेलिया के अश्वेत लोगों पर कोई बहुत ज्यादती हुई. मैं इसलिए भी उन लोगों पर हुए अत्याचार को नहीं मानता क्योंकि एक मजबूत, ऊंची और दुनियादारी की अच्छी समझ वाली नस्ल आई और उसने उनकी जगह ले ली. "
यहूदियों और इस्लाम के खिलाफ टिप्पणी की वजह से भी चर्चिल की आलोचना हुई. 1943 में बंगाल में भारी अकाल के दौरान कोई हस्तक्षेप न करने से भी उन्हें बदनामी मिली. इस अकाल में 20 लाख लोगों की मौत हो गई थी.