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भारत के किन 3 राज्यों की दो-दो राजधानी हैं?


 
भारत के उत्तरी क्षेत्र में मौजूद जम्मू और कश्मीर की दो राजधानी हैं. श्रीनगर, गर्मियों की और जम्मू, सर्दियों की, लेकिन ऐसा क्यूं है, ये आज हम आपको बताने जा रहे हैं?
हर साल जम्मू और कश्मीर में सचिवालय परिवर्तन होता है. सभी सरकारी दफ्तर श्रीनगर से जम्मू और इसके विपरीत क्रम में बदले जाते हैं. जिसे ‘दरबार मूव’ यानी दरबार का तबादला कहा जाता है. मई से अक्टूबर तक सभी सरकारी ऑफिस श्रीनगर में स्थित रहते हैं जो गर्मियों की राजधानी रहती है. वहीं नवंबर से अप्रैल तक सभी दफ्तर जम्मू स्थित होते हैं जो सर्दियों की राजधानी बनती है. जम्मू और कश्मीर स्थित उच्च न्यायालय का भी तबादला होता है और राजधानी भी मौसम अनुसार बदलती है.
क्या है इसके पीछे का इतिहास
‘दरबार मूव’ का इतिहास जानने के लिए हमें 19वीं सदी में जाना होगा. जम्मू और कश्मीर के महाराजा, रणबीर सिंह ने श्रीनगर को जम्मू और कश्मीर की दूसरी राजधानी करार किया था. पहली राजधानी जम्मू ही थी. हालांकि, इसके पीछे उस समय अपने अलग कई तर्क और विचार पेश किए गए थे.
पहले पहल, ट्रीटी ऑफ अमृतसर (1846) के दौरान जम्मू और कश्मीर क्षेत्र ‘डोगरा साम्राज्य’ के अंतर्गत आता था. कश्मीर के लोगों को खुशी देने के लिए श्रीनगर को छह महीने के लिए राजधानी करार किया गया था. और जम्मू को बाकी के बचे छह महीनों के लिए राजधानी कहने के लिए कहा गया था. दूसरा, कश्मीर, गर्मियों के मौसम में काफी सुहाना, सुंदर और आनंदमय जगह मानी जाती थी. इसलिए, राजाओं के लिए गर्मियों का समय यहां छुट्टियां बिताने जैसा था. कुल मिलाकर कहें तो ये काफी रणनीति-संबंधी और मौसमी निर्णय था.
क्यूं 21वीं सदी में भी ऐसा हो रहा है और लोग इसे मान रहे हैं?
कई सालों में इस पर अलग-अलग विचार आए हैं. जो लोग श्रीनगर को एकमात्र राजधानी मानते हैं उनका कहना है कि श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर की जान है. कश्मीर एक तरफ उत्तर में है तो जम्मू, दक्षिण में बसा है. राजनीतिक और भौगोलिक दोनों ही रूप से ये सही है. वहीं, कई लोग इस विचार के खिलाफ भी हैं. सर्दियों में श्रीनगर का तापमान इतना कम हो जाता है कि लोग ठंड से परेशान हो जाते हैं. इसके चलते वे अपना दफ्तर और घर दोनों ही चीजें जम्मू में शिफ्ट होना सही समझते हैं. हालांकि, जम्मू में भी ठंड पड़ती है लेकिन इतनी नहीं जितनी श्रीनगर में होती है. दूसरी ओर दुकानदार और बाकी के व्यापारी श्रीनगर को स्थायी राजधानी मानने से इंकार करते हैं. क्योंकि सर्दियों के समय में वे जम्मू को अपना घर समझकर वहां कमाई का जरिया ढूंढ सकते हैं.
साल 1987 में, डॉ. फ़ारुख़ अब्दूल्ला, जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री थे. उस समय उन्होंने श्रीनगर को एकमात्र राजधानी बने रहने के लिए एक ऑर्डर पास किया था. लेकिन, इस पर जम्मू स्थित दुकानदारों और राजनीतिक लोगों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन को देखते हुए उन्होंने अपना निर्णय बदला.

 
क्यूं नहीं हो सकती दो राजधानियां?
‘दरबार मूव’ करने का मुख्य कारण सर्दियां हैं. श्रीनगर में इस दौरान काम करना काफी मुश्किल होता है. लेकिन, क्या श्रीनगर एक-लौती राजधानी है जहां कड़ाके की ठंड पड़ती है? तापमान गिरता है?
मॉस्को के बारे में सोचिए! ये दुनिया की तीसरी सबसे ठंडी राजधानी है. ठंड में मॉस्को का तापमान -10 डिग्री सेल्सियस होता है. वहीं, अगर श्रीनगर को देखा जाए तो ठंड के मौसम में तीन डिग्री तक ही तापमान गिरता है. जब रूस की एक राजधानी हो सकती है तो जम्मू और कश्मीर की क्यूं नहीं?
मौसमी समस्याओं के अलावा हर साल करोड़ों रुपये सरकारी दस्तावेजों को इधर से उधर करने और कई ट्रकों में सामान लादने पर खर्च किए जाते हैं. सरकार, अफसर और अधिकारियों को जम्मू और कश्मीर में घर मुहइय्या कराती है जिस पर काफी खर्चा होता है. लेकिन लोगों की मर्जी है. विरोध प्रदर्शन न हो इसके लिए सरकार ने जम्मू और कश्मीर की दो राजधानियां रखी हुई हैं. आगे चीजें बेहतर होंगी इसकी उम्मीद है.
भारत के तीन राज्यों की हैं दो राजधानी
जम्मू और कश्मीर के बाद महाराष्ट्र की भी दो राजधानी हैं. एक नागपूर और दूसरी मुंबई. वहीं, हिमाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री ने शिमला के बाद धर्मशाला को इस राज्य की दूसरी राजधानी के तौर पर एलान किया हुआ है. भारत में ये तीसरा ऐसा राज्य है जिसकी दो राजधानी हैं.
जम्मू-कश्मीर बना केंद्र शासित प्रदेश
जम्मू-कश्मीर इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रहा है. एक नवंबर 2019 से औपचारिक रूप से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। इस से जम्मू-कश्मीर के उथल-पुथल भरे इतिहास में नया अध्याय जुड़ गया है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 की समाप्ति और जम्मू कश्मीर व लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के निर्णय के बाद बड़े स्तर पर कई नए प्रशासनिक बदलाव किए जा रहे हैं. नई व्यवस्थाएं स्थापित हो रही हैं और कई पुरानी व्यवस्थाओं व परंपराओं का त्याग भी किया जा रहा है. मगर जम्मू-कश्मीर की अपनी विशेष पहचान से जुड़ी कुछ स्थापित परंपराएं ऐसी भी हैं जिनमें कोई बदलाव नही किया जा रहा.
केंद्र शासित प्रदेश बनने के बावजूद पहले की तरह जम्मू-कश्मीर की दो राजधानियां बनी रहेंगी और वर्षों पुरानी ‘दरबार मूव’ जैसी अहम परंपरा भी जारी रखी जाएगी. हालांकि राज्य का स्वरूप व आकार बदलने से कुछ स्वाभाविक परिवर्तन ‘दरबार मूव’ की परंपरा में भी होने जा रहे हैं.
सर्दियों में ‘दरबार’ का श्रीनगर से जम्मू आना और गर्मियों में ‘दरबार’ का जम्मू से वापस श्रीनगर जाना तो हर साल दो बार होता ही रहा है लेकिन इस बार सर्दियों में हुआ ‘दरबार मूव’ तकनीकी रूप से अविभाजित जम्मू-कश्मीर राज्य का अंतिम ‘दरबार मूव’ माना गया। अंतिम इसलिए, क्योंकि आने वाली गर्मियों में जब दोबारा ‘दरबार मूव’ होगा तो उस समय तक जम्मू-कश्मीर राज्य का स्वरूप और आकार बदल चुका होगा. तब से जम्मू-कश्मीर की पहचान एक ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के रूप में बन चुकी है। और उस नई व्यवस्था में जम्मू-कश्मीर राज्य का नही बल्कि ‘केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर’ का ‘दरबार मूव’ होगा.
लगभग 147 वर्ष पुरानी ‘दरबार मूव’ परंपरा के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब तकनीकी रूप से लद्दाख किसी भी तरह से ‘दरबार’ का हिस्सा नहीं रहेगा.उल्लेखनीय है कि गत 5 अगस्त को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद-370 को समाप्त कर दिया था. इसी के साथ जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा भी खत्म हो गया था और राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था.

 
जारी रहेगी ‘दरबार मूव’ की परंपरा
ज्ञात हो की जम्मू-कश्मीर का भले ही विभाजन हो गया हो और एक पूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में परिवर्तित हो रहा है. मगर हर छह महीने बाद होने वाली ‘दरबार मूव’ की अर्धवार्षिक परंपरा बिना किसी रुकावट के आगे भी जारी रहेगी और वर्षों से जारी परंपरा के अनुसार सचिवालय और अन्य सरकारी कार्यालय सर्दियों में जम्मू व गर्मियों में श्रीनगर स्थानांतरित होती रहेंगे.
उल्लेखनीय है कि कश्मीर के कड़क सर्द मौसम और जम्मू की भीषण गर्मी को देखते हुए पूर्व डोगरा शासक महाराजा रणबीर सिंह ने 1872 में ‘दरबार मूव’ की अर्धवार्षिक परंपरा की शुरुआत की थी. ऐसा माना जाता है कि महाराजा रणबीर सिंह द्वारा ‘दरबार मूव’ की परंपरा को शुरू करने के पीछे एक अहम व बड़ा मकसद राज्य के सभी हिस्सों तक बेहतर ढंग से प्रशासनिक पहुंच बनाना था.
लगभग 147 वर्षों से जम्मू-कश्मीर में हर छह माह बाद राजधानी बदलती रही है. सर्दियों में छह माह के लिए राजधानी जम्मू में रहती है जबकि गर्मियां आते ही यह श्रीनगर स्थानांतरित हो जाती है. इसी को ‘दरबार मूव’ कहा जाता है.
स्थानांतरण की इस प्रक्रिया में राज्य विधानसभा, राज्य विधानपरिषद, राज्य सचिवालय, राज्य उच्च न्यायालय, राजभवन व मुख्यमंत्री के कार्यालय के साथ-साथ पुलिस मुख्यालय सहित अन्य कई कार्यालय सर्दियों में श्रीनगर से जम्मू और फिर छह माह बाद गर्मियां आने पर जम्मू से श्रीनगर स्थानांतरित होते हैं. राज्य सचिवालय और अन्य कार्यालयों को ही तकनीकी रूप से ‘दरबार’ कहा जाता है.
‘दरबार’ के स्थानांतरण की इस प्रक्रिया के कारण ही जम्मू को जम्मू-कश्मीर की शीतकालीन राजधानी कहा जाता है जबकि श्रीनगर जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी कहलाती है.
कई साल पहले जब गर्मियों में श्रीनगर और सर्दियों में ‘दरबार’ को जम्मू स्थानांतरित करने की जिस परंपरा की शुरुआत हुई वह समय के साथ और भी मज़बूत होती चली गई है. ‘दरबार मूव’ का यह सिलसिला धीरे-धीरे एक बड़ी प्रशासनिक ज़रूरत भी बन गया. वक्त बदला, राज्य के इतिहास में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन ‘दरबार मूव’ की परंपरा न रुकी न थमी.
इस परंपरा का जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में ज़बर्दस्त असर रहा है और आम आदमी तक का इस परंपरा से किसी न किसी रूप से जुड़ाव रहा है. ‘दरबार मूव’ की परंपरा ने राज्य के सभी हिस्सों के लोगों को आपस में जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह ज़रूरत आगे भी बनी रहेगी.
वैसे देखे जाए तो पूरे देश में अपनी तरह की यह अलग व अनोखी परंपरा है.