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जानें क्या है इस्लाम धर्म में शब-ए-बारात का महत्व और कैसे मनाया जाता है ये त्योहार


शब-ए-बारात को इस्लाम धर्म में इबादत की रात के तौर पर जाना जाता है। शब-ए-बारात की रात इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक आठवें महीने की 15 वीं तारीख को आती है।
इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक शब-ए-बारात आज है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार इस रात इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग अल्लाह की इबादत में मनाते हैं। साथ ही शब-ए-बारात की रात मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग अपने गुनाहों की तौबा करते हैं।
शब का मतबल रात होता है और बरआत का अर्थ बरी होना होता है। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है।
इस्लाम में यह रात बेहद फजीलत की रात मानी जाती है। इस रात को मुस्लिम दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं। शब-ए-बारात की सारी रात इबादत और तिलावत का दौर चलता है। इस रात अपने उन परिजनों, जो दुनिया से रुखसत हो चुके हैं, उनकी मगफिरत की दुआएं की जाती है।

शब-ए-बारात पर ऐसे करते हैं गुनाहों का तौबा
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार यह रात पूर्व के समय में किए गए कर्मों का लेखा जोखा तैयार करने और आने वाले साल की तकदीर तय करने वाली मानी जाती है। इसलिए इस रात को शब-ए-बारात के तौर पर जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि तौबा की इस रात को अल्लाह तआला अपने बंदों का पूरे साल का हिसाब-किताब करते हैं।
इस रात को पूरी तरह इबादत में गुजारने की परंपरा है। बरकत वाली इस रात में हर जरूरी और सालभर तक होने वाले काम का फैसला किया जाता है और यह तमाम काम फरिश्तों को सौंपे जाते हैं।

कैसे मनाया जाता है ये दिन
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस रात को शानदार सजावट की जाती है। इस रात को मुस्लिम धर्मावलंबियों के द्वारा जुलूस और जल्से का इंतज़ाम किए जाते हैं। शब-ए-बरात की रात शहर में कई स्थानों पर जलसों का आयोजन किया जाता है। हालांकि, इस बार लॉकडाउन के चलते पुरुषों को मस्जिदों और कब्रिस्तान में जाने की इजाज़त नहीं होगी। इसलिए इस बार पुरुष भी घरों में रहकर नमाज़ पढ़ेंगे और इबादत करेंगे।