एशिया या जम्बुद्वीप आकार और जनसंख्या दोनों ही दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है, जो उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। पश्चिम में इसकी सीमाएं यूरोप से मिलती हैं, हालाँकि इन दोनों के बीच कोई सर्वमान्य और स्पष्ट सीमा नहीं निर्धारित है। एशिया और यूरोप को मिलाकर कभी-कभी यूरेशिया भी कहा जाता है।
क्या आपने कभी किसी ऐसे गांव के बारे में सुना है जहां के नागरिकों के खाते में करोड़ों रुपये जमा हों। या फिर आपको किसी ऐसे गांव के बारे में मालूम है जहां शहरों जैसी सारी सुविधाएं मौजूद हैं। ज्यादातर लोगों का जवाब ना में होगा। लेकिन आज हम आपको दुनिया के ऐसे ही एक गांव के बारे में बताते हैं। यह गांव हमारे पड़ोसी देश चीन के जियांगसू प्रांत में है जिसका नाम वाक्शी है लेकिन इसे सुपर विलेज का नाम दिया गया है। 
गांव के नाम के अनुसार ही यहां के लोग शान से अपना जीवनयापन करते हैं। जानकारी के मुताबिक इस गांव के हर शख्स के खाते में लगभग 1.50 करोड़ रुपये से भी ज्यादा राशि जमा है। केवल इतना ही नहीं यहां के हर नागरिक के पास आलीशान घर और चमचमाती गाड़ियां हैं। इस गांव को करोड़ों डॉलर की कंपनियों का गढ़ माना जाता है जिसमें स्टील और शिपिंग जैसी मुख्य कंपनियां शामिल हैं।

भारत के लिए बेहद गर्व की बात है कि पूरे एशिया का सबसे समृद्ध और सबसे अमीर गांव भारत के गुजरात राज्य के कच्छ जिले में है जिस गांव का नाम माधापर है।
माधापर गांव के लोगों का मुख्य पेशा खेती बारी है।
माधवपुर गांव में कुल 2000 लोगों की बस्ती है। गांव में करीब 16 बैंक है, पोस्ट ऑफिस है प्राथमिक शिक्षा से लेकर इंटर कॉलेज है ..गौशाला है
गांव में सुख सुविधाओं से युक्त हेल्थ सेंटर भी है तमाम मंदिर और कम्युनिटी हॉल भी है ।
जब आप माधवपुर गांव में प्रवेश करेंगे तभी आपको गांव का भव्य गेट ही गांव की समृद्ध ताकि कहानी कहता है..
गांव के पोस्ट ऑफिस में करीब 200 करोड़ की डिपाजिट है। वही गांव में कुल 17 बैंक हैं और हर एक बैंक में 100 करोड़ के आसपास की डिपॉजिट जमा है
वैसे मधापर एक गांव है लेकिन गांव में कई इंग्लिश मीडियम के स्कूल हैं गांव में कई शॉपिंग माल भी खुल चुके हैं..
इस गांव की सबसे खास बात यह है कि इस गांव के हर घर से दो लोग विदेशों में रहते हैं और गांव के कई परिवार पहले से ही विदेशों में सेटल हो चुके हैं। यहां के लोग ब्रिटेन अमेरिका कनाडा और केन्या में रहते हैं।
माधापर गांव के लोग भले ही विदेश में रहते हैं लेकिन अपने गांव को नहीं भूले हैं और अपने गांव में भी काफी पैसा जमा करते हैं। 1968 में ही लंदन में माधापर विलेज एसोसिएशन नामक संगठन बना और उसका कार्यालय को खोला गया ताकि ब्रिटेन में रहने वाले सभी माधापर गांव के लोग एक दूसरे से किसी न किसी सामाजिक कार्यक्रम के बहाने मिलते रहे।
गांव में भी n.r.i. लोगों ने अपना एक कार्यालय खोला है जिसके तहत में गांव के युवाओं को विदेश में नौकरी तैयारी के मौके देते रहते हैं