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अपनी ज़िंदगी के कुछ अलग ही उसूल हैं, दोस्ती की खातिर हमें काँटे भी क़बूल हैं

1. मैं हर चीज़ भूल जाते हूँ, जब खुदा के इश्क़ में खो जाता हूँ।
2. अपनी ज़िंदगी के कुछ अलग ही उसूल हैं, दोस्ती की खातिर हमें काँटे भी क़बूल हैं, हँस कर चल देंगे काँच के टुकड़ों पर भी, अगर दोस्त कहे यह दोस्ती में बिछाये फूल हैं।

मैं हर चीज़ भूल जाते हूँ, जब खुदा के इश्क़ में खो जाता हूँ
 
 

 
 

 
 
3. जिस का मौसम बदलता रहता है, कैसे अपनी गिरफ़्त में आए, आगही इक बसीत दरिया है इस में ज़ुल्मत पनप नहीं सकती, ज़ेहन सूरज की ताब रखता है।
4. बस एक जोत जगी है कहीं कोई भी नहीं है, मिज़ाज-ए-वस्ल ब-हर-रंग-ए-आरिफ़ाना हुआ है, कुछ और धूप मिरे ग़म कुछ और अश्क झमाझम, घना हुआ है ये जंगल तो शामियाना हुआ है, मिरे निगार-ए-गुरेज़ाँ तुझे मैं कैसे भुला दूँ।
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