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शहरों का ये सन्नाटा बता रहा है, इंसानो ने कुदरत को नाराज़ बहुत किया है

. ये शहरों का सन्नाटा बता रहा है, इंसानो ने कुदरत को नाराज़ बहुत किया है।
2. सजा ना दे मुझे बेकसूर हूं मैं थाम ले मुझको गमों से चूर हूं मैं, तेरी दूरी ने कर दिया है पागल मुझे और लोग कहते हैं कि मगरूर हूं मैं।

ये शहरों का सन्नाटा बता रहा है, इंसानो ने कुदरत को नाराज़ बहुत किया है
 
 

 
 

 
 
3. देखा पलट के उसने चाहत उसे भी थी, दुनिया से मेरी तरह शिकायत उसे भी थी, वो रोया बहुत मुझको परेशान देख कर, उस दिन पता चला की मेरी जरुरत उसे भी थी।
4. अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर, अंधेरों में तुम तो मिल जाते हो, साया नहीं मिलता, इस बेवफ़ा ज़िन्दगी से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं मिलता।